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नई संस्था शुरू करना एक बात है और उसे चलाने के लिए पैसे जुटाना बिल्कुल दूसरी। ज़्यादातर छोटे NGO इसी जगह अटक जाते हैं। काम करने का मन होता है, लोगों की ज़रूरत भी साफ़ दिखती है, लेकिन हाथ में इतना पैसा नहीं होता कि काम आगे बढ़े।
अच्छी बात यह है कि फंडिंग का मतलब सिर्फ़ बड़ी कंपनियों या सरकार से मिलने वाला पैसा नहीं है। कई रास्ते ऐसे हैं जिन पर पहले दिन से चला जा सकता है। इस लेख में हम इन रास्तों को आसान से थोड़े कठिन के क्रम में देखेंगे, ताकि आप तय कर सकें कि आपकी संस्था के लिए शुरुआत कहाँ से ठीक रहेगी।
“आसान” का मतलब क्या है
यहाँ आसान उस स्रोत को कहा गया है जिसमें कागज़ी काम कम हो, पैसा जल्दी मिल सके और किसी लंबे रिकॉर्ड की ज़रूरत न पड़े। जिन स्रोतों में कड़ी शर्तें और लंबी प्रक्रिया है, उन्हें बाद में रखा गया है। एक बात हर जगह लागू होती है: जो भी पैसा आए, उसका हिसाब शुरू से साफ़ रखिए।
1. अपने आसपास के लोग
परिवार, दोस्त, पड़ोसी और जान-पहचान के लोग सबसे पहला और सबसे भरोसेमंद सहारा होते हैं। इन्हें आपके इरादे का पता होता है और आपको समझाने में ज़्यादा मेहनत नहीं लगती।
सीधे और साफ़ तरीके से बात कीजिए। बताइए कि आप क्या काम कर रहे हैं, कितने पैसे की ज़रूरत है और वह कहाँ खर्च होगा। बड़ी रकम माँगने की जगह छोटी रकम माँगिए। कोई 100 रुपये दे सकता है, कोई 500।
एक तरीका जो बहुत काम आता है, वह है मासिक सदस्यता। मान लीजिए 20 लोग हर महीने 500 रुपये देने को तैयार हो जाएँ, तो हर महीने 10,000 रुपये आपके पास आएँगे। एक बार के बड़े दान से यह ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है, क्योंकि आप आने वाले महीनों का खर्च पहले से सोचकर चल सकते हैं।
इन लोगों को महीने में एक बार छोटी-सी जानकारी भेजिए। कुछ तस्वीरें, कितना पैसा आया और कहाँ लगा। जिसे अपने पैसे का नतीजा दिखता है, वह अगली बार भी देता है।
2. स्थानीय दुकानदार और व्यवसायी
आपके इलाके के दुकानदार, डॉक्टर, स्कूल चलाने वाले और छोटे कारखाने वाले अक्सर किसी अच्छे काम में हाथ बँटाना चाहते हैं। उन्हें आपका काम अपनी आँखों से दिख जाता है, इसलिए भरोसा जल्दी बनता है।
ज़रूरी नहीं कि हर बार नकद ही माँगा जाए। कोई कॉपियाँ दे सकता है, कोई राशन, कोई दवाइयाँ, कोई टेंट और कुर्सियाँ। छपाई वाला आपके पर्चे छाप सकता है। इस तरह का सहयोग भी आपका खर्च बचाता है।
मिलने जाइए तो एक पन्ने का परिचय साथ रखिए। उसमें संस्था का नाम, काम, अब तक की उपलब्धि और संपर्क नंबर हो। बात छोटी और सीधी रखिए।

3. ऑनलाइन चंदा और सोशल मीडिया
आज बहुत से लोग फ़ोन से ही दान देना पसंद करते हैं। भारत में कई ऑनलाइन चंदा जुटाने वाले प्लेटफ़ॉर्म हैं, जैसे Ketto और Milaap। इन पर आप अपनी संस्था या किसी ख़ास काम के लिए अभियान बना सकते हैं। ऐसे प्लेटफ़ॉर्म आमतौर पर कुछ शुल्क लेते हैं, इसलिए जुड़ने से पहले उनकी शर्तें ध्यान से पढ़ लीजिए।
अगर प्लेटफ़ॉर्म नहीं चाहिए तो अपने बैंक खाते का UPI QR कोड भी बनवाया जा सकता है। उसे WhatsApp, फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर साझा कीजिए।
ऑनलाइन अपील में कुछ बातें ज़रूर रखिए:
- एक सच्ची कहानी, किसी एक बच्चे, परिवार या गाँव की।
- कितनी रकम चाहिए और वह किस काम में लगेगी।
- कुछ असली तस्वीरें, जो आपने खुद खींची हों।
- पैसा आने के बाद उसका नतीजा दिखाने का वादा, और फिर उसे निभाना।
4. सामुदायिक कार्यक्रम
छोटे आयोजन पैसा भी जुटाते हैं और लोगों में आपकी पहचान भी बनाते हैं। सांस्कृतिक संध्या, स्कूल के बच्चों का कार्यक्रम, किताबों की बिक्री, त्योहार के समय हस्तशिल्प का मेला या मोहल्ले की दौड़, ये सब आज़माए जा सकते हैं।
बस एक सावधानी रखिए। आयोजन का खर्च कम रखिए, वरना जितना कमाएँगे उतना खर्च हो जाएगा। पहले से हिसाब लगा लीजिए कि टिकट या दान से कितना आएगा और खर्च निकालकर कितना बचेगा। जहाँ ज़रूरी हो, स्थानीय प्रशासन से अनुमति भी लीजिए।
5. अपनी सेवाओं या उत्पादों से आमदनी
कई संस्थाएँ अपने काम से ही कुछ कमाई कर लेती हैं। प्रशिक्षण के लिए छोटा शुल्क, महिलाओं के बनाए सामान की बिक्री या सदस्यता शुल्क जैसे तरीके इसी में आते हैं।
इससे संस्था की निर्भरता दूसरों पर कम होती है। लेकिन ध्यान रहे कि इस आमदनी का उपयोग संस्था के उद्देश्य के लिए ही होना चाहिए। इस पर कर के नियम क्या कहते हैं, यह किसी अनुभवी अकाउंटेंट से पूछ लीजिए।
6. CSR फंड
कंपनियाँ अपने मुनाफ़े का एक हिस्सा सामाजिक कामों पर खर्च करती हैं। कुछ बड़ी कंपनियों के लिए यह कानून के तहत ज़रूरी है, और वे अपने औसत शुद्ध मुनाफ़े का 2 प्रतिशत इस पर लगाती हैं। इसी को CSR कहा जाता है।
लेकिन यह नई संस्था के लिए सबसे आसान रास्ता नहीं है। कंपनियों से पैसा पाने के लिए आमतौर पर इन बातों की ज़रूरत पड़ती है:
- संस्था का 12A और 80G पंजीकरण।
- कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) के पोर्टल पर CSR-1 फ़ॉर्म भरकर पंजीकरण।
- काम का कुछ समय का रिकॉर्ड, जिसमें रिपोर्ट, तस्वीरें और ऑडिट किया हुआ हिसाब शामिल हो।
इसलिए इसे दूसरे या तीसरे चरण का स्रोत समझिए। तैयारी अभी से शुरू कर दीजिए। अपने काम की रिपोर्ट बनाइए और हिसाब सही रखिए। शुरुआत अपने ज़िले या शहर की किसी स्थानीय कंपनी से कीजिए। वहाँ पहचान बनाना आसान होता है और कंपनी को आपका काम पास से देखने का मौका मिलता है।
7. सरकारी योजनाएँ और अनुदान
केंद्र और राज्य सरकारें कई विभागों के ज़रिये संस्थाओं को सहायता देती हैं। महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे विभागों में अलग-अलग योजनाएँ चलती हैं। हर योजना की अपनी शर्तें होती हैं।
शुरुआत के लिए दो काम कीजिए। पहला, सरकार के NGO दर्पण पोर्टल पर अपनी संस्था का पंजीकरण करवाइए। कई योजनाओं में इसकी ज़रूरत पड़ती है। दूसरा, अपने ज़िले में संबंधित विभाग के दफ़्तर जाकर पूछिए कि आपके काम से जुड़ी कौन-सी योजना चल रही है।
यहाँ प्रक्रिया लंबी होती है और पैसा आने में देर लग सकती है। इसलिए पूरी तरह इसी पर निर्भर मत रहिए। इसे अपने दूसरे स्रोतों के साथ एक अतिरिक्त सहारे की तरह रखिए।
8. फ़ाउंडेशन और निजी ट्रस्ट
कुछ निजी फ़ाउंडेशन और पारिवारिक ट्रस्ट संस्थाओं को अनुदान देते हैं। हर फ़ाउंडेशन का एक ख़ास क्षेत्र होता है, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य या आजीविका। उनकी वेबसाइट पर लिखा रहता है कि वे किस तरह के काम को सहयोग देते हैं और आवेदन कैसे करना है।
आवेदन भेजने से पहले उनकी शर्तें पढ़िए। जिस काम में उनकी रुचि नहीं है, उसके लिए आवेदन देने से समय बेकार जाता है। शुरुआत में छोटे अनुदान के लिए आवेदन कीजिए। एक बार काम सही ढंग से पूरा हो जाए, तो अगली बार बड़ी रकम माँगना आसान हो जाता है।
9. विदेश से मिलने वाला दान
विदेश से पैसा लेना आकर्षक लगता है, लेकिन यहाँ कानून सख़्त है। भारत में किसी भी विदेशी स्रोत से दान लेने के लिए FCRA के तहत सरकार से पंजीकरण या अनुमति ज़रूरी है। बिना अनुमति के विदेशी पैसा लेना कानूनन गलत है और इससे संस्था को गंभीर परेशानी हो सकती है।
इसलिए नई संस्था के लिए सलाह यही है कि पहले देश के भीतर के स्रोतों पर ध्यान दें। अगर विदेश में रहने वाला कोई जान-पहचान का व्यक्ति मदद करना चाहे, तो पहले FCRA के नियम पूरी तरह समझ लीजिए। बिना जाने कोई रकम स्वीकार मत कीजिए।
पैसा लेने से पहले ये तैयारी कर लीजिए
किसी भी स्रोत से पैसा लेने से पहले आपके पास कुछ बुनियादी चीज़ें होनी चाहिए:
- संस्था का पंजीकरण, चाहे ट्रस्ट हो, सोसाइटी हो या सेक्शन 8 कंपनी।
- संस्था का PAN कार्ड।
- संस्था के नाम से अलग बैंक खाता।
- 12A और 80G पंजीकरण।
12A से संस्था की अपनी आय पर कर में छूट मिलती है। 80G से दान देने वाले को अपने कर में राहत मिलती है, इसलिए कई दानदाता और कंपनियाँ पूछती हैं कि आपके पास 80G है या नहीं। नई संस्था को आमतौर पर पहले कुछ सालों के लिए अस्थायी पंजीकरण मिलता है, और बाद में नियमित पंजीकरण के लिए आवेदन करना पड़ता है। समय रहते नवीनीकरण करवाना न भूलिए, वरना इसका असर CSR जैसी सुविधाओं पर भी पड़ता है।
दान की रसीद देना और हर साल हिसाब का ऑडिट करवाना भी इसी तैयारी का हिस्सा है। नियम समय के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए आवेदन करने से पहले आयकर विभाग की वेबसाइट या किसी अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट से ताज़ा जानकारी ले लीजिए।
फंडिंग माँगने का प्रस्ताव कैसे लिखें
जब भी किसी कंपनी, फ़ाउंडेशन या विभाग को आवेदन भेजें, तो एक पन्ने का साफ़ प्रस्ताव बनाइए। उसमें ये बातें हों:
- समस्या क्या है और कितने लोग उससे प्रभावित हैं।
- आप क्या काम करेंगे और कितने समय में।
- कुल कितने पैसे की ज़रूरत है और वह किस मद में खर्च होगा।
- काम पूरा होने पर क्या बदलाव आएगा और आप उसे कैसे नापेंगे।
- आपकी टीम में कौन है और संपर्क कैसे किया जाए।
भाषा सीधी रखिए। बढ़ा-चढ़ाकर लिखी बातें अनुभवी लोग तुरंत पहचान लेते हैं। जो आँकड़े आपके पास हैं, वही लिखिए। जिसकी जानकारी नहीं है, उसे ईमानदारी से मान लीजिए।
फंडिंग जुटाने में होने वाली आम गलतियाँ
सिर्फ़ एक स्रोत पर निर्भर रहना। अगर वही स्रोत बंद हो गया, तो पूरा काम रुक जाएगा। कम से कम तीन अलग-अलग जगहों से पैसा आए, यह कोशिश रखिए।
हिसाब में ढील। शुरुआत में छोटी रकम के लिए रसीद न काटना बाद में बड़ी परेशानी बन जाता है। हर पैसे का रिकॉर्ड रखिए।
दानदाताओं को भूल जाना। पैसा लेने के बाद चुप हो जाना सबसे बड़ी गलती है। जिसने मदद की, उसे बताइए कि उसके पैसे से क्या हुआ।
बहुत जल्दी बहुत बड़ी रकम माँगना। काम का रिकॉर्ड बने बिना बड़ी रकम मिलना मुश्किल है। छोटी शुरुआत कीजिए और भरोसा बनाइए।
शर्तें पढ़े बिना पैसा ले लेना। हर अनुदान की अपनी शर्तें होती हैं। पैसा किस काम में लग सकता है और किसमें नहीं, यह पहले ही समझ लीजिए।
अंत में
फंडिंग का कोई एक पक्का रास्ता नहीं होता। जो संस्था आज बड़े-बड़े अनुदान पा रही है, उसने भी शुरुआत अपने लोगों से, छोटी रकम से और छोटे आयोजनों से ही की थी।
अगर आप अभी शुरुआत कर रहे हैं, तो तीन काम से शुरू कीजिए। पहला, अपने जान-पहचान के लोगों से मासिक सदस्यता की बात कीजिए। दूसरा, अपने इलाके के कुछ व्यवसायियों से मिलिए। तीसरा, एक छोटा ऑनलाइन अभियान चलाइए। साथ-साथ 12A और 80G की तैयारी कीजिए और हिसाब साफ़ रखिए। जब यह नींव तैयार हो जाए, तब CSR और सरकारी योजनाओं की ओर बढ़िए।
भरोसा सबसे बड़ी पूँजी है। उसे बनने में समय लगता है, पर एक बार बन जाए तो पैसे का रास्ता खुद बनने लगता है।







